कालेज हम कभी गये नही , स्कूल जाने के दिनो मे अकसर स्कूल के पीछे पराठे खाते जरूर पकडे जाते थे. सो हमे आप कतई गवार, अनपढ, जाहिल, खरदिमाग बेअकलो की श्रेणी मे रख सकते है. लेकिन जनाब हमारी इस तुच्छ मोटी बुद्धी मे पिछले दिनो ब्लोग पढ कर कुछ सवाल गूंज रहे है .जिनका जवाब तलाशने मे पिछले दिनो हम बिलकुल नाकाम रहे.
सो आप बुद्धीमान लोगो के सामने मै ये अपने सवाल रख रहा हू . कृपया मेरी शंका का निवारण करे.
पिछले दिनो कुछ ब्लोगर्स ने मुंबई ताज घूमने आये महान पाक नागरिक (भारतीय नागरिको के अनुसार मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी) मासूम * मोहम्मद अजमल आमिर कसाब और उनके कुल जमा १६६ हत्याओ के छोटे से कुकर्मो के साथ उनके वकील की हर जायज नाजायज चालो को को न्यायोचित ठहराने मे लगे हुये थे. . महान दाऊद भाई के खासमखास वकील अब्बास काजमी, जिनका कहना था कि इस केस में जीत बेहद मुश्किल है, लेकिन मैं न्यायालय ** मे कसाब को बचाने की हर मुमकिन कोशिश करूंगा. काजमी जी ने माना था कि- कसाब के खिलाफ काफी सबूत हैं। लेकिन वो उन्हे झुठलाने की पूरी इमानादारी से कोशिश करेगे . हम सब ये देख भी रहे है कि वो लगातार उसे इस बारे मे ज्ञान दे भी रहे है . जिसके चलते कसाब कभी अपनी उम्र कम बताने की कस्मे खा लेता है कभी उसे उर्दू के अलावा कुछ समझ नही आता कभी उसे अखबार चाहिये होता है. यानी वकील *** साहब अपने धंधे के प्रति पूरी इमानदारी दिखाते हुये उसे मुकदमे को लंबा खीचने की हर मुमकिन कोशिश करने मे लगे है . इस सारे न्याय के खेल मे वकील के हिसाब से न्याय उसके मुवक्किल के हित के अलावा कुछ नही होता . ऐसा हमारे एक ब्लोगर वकील साहब का भी कहना है.यानी उसके द्वारा मारे गये लोगो के प्रति उसके वकील की कोई जिम्मेदारी नही होती . यही है न्याय की परिभाषा हमारे ब्लोगर वकील मित्र के हिसाब से .
यानी किसी के भी मानवाधिकार की ऐसी तैसी करदो फ़िर एक अच्छा वकील पकडो जो आपके मानवाधिकार के लिये न्यायालय मे न्याय की मांग करेगा . जिनके खिलाफ़ आपके अपराध किया है उन्हे झूठा ठहरायेगा. और आपको दुबारा वही सब करने के लिये न्याय दिलवायेगा . मुझे तो हसी आ रही है आपका पता नही . साहब आपकी बात से तो हमे यही समझ मे आता है कि नन्दा केस मे आई यू खान
और आर के आनन्द भी अपने मुवक्किल के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे .आखिर येन केन प्रकारेण उन्हे अपने मुवक्किल को निर्दोष साबित कराने की हर मुमकिन कोशिश मे लगे हुये थे , अपने काम के प्रति पूरी इमानदारी से लगे हुये थे . यानी उन के साथ जो कोर्ट ने किया वो सरासर गलत था ? या फ़िर आप यह कहना चाह रहे है कि वो अपने मुवक्किल के प्रति पूरी इमानदारी से कार्य तो सही कर रहे थे .लेकिन पकडॆ नही जाना चाहिये था . इससे हमे यही समझ मे आता है की अपराध करना कतई बुरा नही है . पकडे जाना बुरा है यही है जाने माने वकीलो की दूर्ष्टी मे न्याय . अब यही वकील साहब कुछ परिक्षाये पास कर न्यायाधीश बन जाते है सो न्याय के बारे मे न्यायालय के बाये मे आप सब अपनी राय बदल ही ले तो बढिया .
जैसे की देश के और लाखो केसो मे नही पकडे जाते . बाकी जो मरे उनके साथ हुये न्याय या अन्याय से बचाव पक्ष का कोई लेना देना नही होता. शायद आप वकील लोग की सोच यही बनाई जाती होगी पढाई के दिनो मे . आपको सच क्या है ? इससे कोई लेना देना नही . जिससे आपको पैसे मिले वो बलातकारी सही ,गुंडा सही ,डकैत सही, पर आपको उसे न्याय के नाम पर कोई भी दंद फ़ंद कर गवाहो को तोड उन्हे इस हद तक दुखी करे कि वो उस केस से या तो हट जाये या फ़िर आपके हिसाब से गवाही देदे , और आप उसे बाईज्जत निर्दोष साबित करदे .क्या वकालत पढते पढते लोगो की अंतराआत्मा साथ छॊड जाती है ? तभी वकील साह्ब बलातकार की शिकार महिला को अपने बलातकारी मुवक्किल के फ़ेवर मे बदचलन साबित करने और भद्दे सवाल पूछने मे लग जाते है ?
जरा सोचिये उस जगह किसी दिन आपके परिवार का कोई सदस्य हो , क्या तब भी आप उस बलातकारी गुंडे डकैत की तरफ़दारी करगे . जब आपका ही कोई सहयोगी आपके दर्द मे भागी दार बनने के बजाय आपके दर्द् की बखिया उधेड रहा होगा तब आपको कैसा लगेगा बंधु ? सोचियेगा ? अगर कही आपकी अंतरात्मा भी जिंदा बची हुई हो तो ? वरना लगे रहिये अपने धत कर्मो के बोझ से उसे दबाकर मारने मेखैर छोडिये ये सब . मै आपको एक बात बताना भूल गया . अगर कोई गरीब बंदा बेचारा वक्त का मारा गरीब आदमी किसी गुनाह मे . कही झगडा कर बैठा .किसी को गुस्से मे हसिया उठाकर फ़ेक कर मार दिया . और न्यायालय मे अपने बचाव के लिये कोई वकील खडा नही कर पाया तो न्यायालय उसके पक्ष को प्रस्तुत करने के लिये एक वकील मुहैया कराता है जिसे पूरा मुकदमा लडने के लिये ९०० रुपये सरकार की और से दिये जाते है.
अब ये बात जज साहब भी जानते है कि ९०० रुपये मे नंगा नहायेगा क्या निचोडेगा क्या ? लेकिन एक गरीब गुर्गे भारतीय नागरिक की क्या औकात जो
उसके बारे मे किसी को कुछ सोचने की फ़ुरसत हो ? क्या आपको पता है कि भारतीय जेलो मे बंद आधे से ज्यादा लोग ऐसे है जिन्हे मुकदमे के फ़ैसले मे ज्यादा से ज्यादा दो साल की सजा होती परंतु उन्हे सालो हो चुके है जेलो मे पडे हुये क्योकी ना तो उनसे मिले सरकारी ९०० रुपये वाले वकील को मतलब है नाही प्रशासन को .
लेकिन जनाबे आली मुंबई मे इत्ते भारतीयो को मारने वाले बंदे को न्याय मिलने की फ़िकर देश के बाकी महानुभावो को ,वकीलो को और न्यायाधिकारियो को इतनी है कि उसके लिये ढूंढ कर इसी प्रकार के अपराधियो का मुकदमा लडने**और उन्हे बचाने के महान कृत्य मे संलग्न बंदे तो तलाश ही लाये . मजे की बात यह है कि इससे पहले जो भी वकील इस केस को लडने के लिय़े खडे हुये उनके घर जाकर तोड फ़ोड की गई पर इनके आते ही तोड फ़ोड वाले अपने अपने घर जाकर सो गये . शायद वो इसी लिये बाकियो को धमका रहे होंगे कि केवल ये जनाब ही इस केस मे मुकदमा लड सकने के लिये दाऊद भाई ने तलाश रखे होंगे. जो कसाब या उसके वकील के साथ खडा नही हो सका वो उसे बाहर से समर्थन दिलाने मे लग गया. या मुझे पता नही होगा चोर चोर मौसेरे भाई की तरह धत करमो मे वकील वकील मौसेरे भाई ही होते होंगे.
अब जनाब काजिम साहब साहब के केस संभालते ही अचानक जो अज़मल कसाब पहले तोते की तरह सारी बातें उगल-उगलकर बता रहा था, धूर्त वकील की संगत में आते ही घाघ लोमड़ी की तरह बर्ताव करने लगा है। सबसे पहले तो वह अपनी कही पुरानी सारी बातों से ही मुकर गया, फ़िर उसके काबिल वकील ने उसे यह भी पढ़ाया कि “वह अदालत से माँग करे कि वह नाबालिग है, इसलिये उस पर इस कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये”, फ़िर अज़मल कसाब ने एक और पाकिस्तानी वकील की भी माँग की, अब उसके माननीय वकील ने माँग की है कि पूरे 11000 हजार पेजों की चार्जशीट का उर्दू अनुवाद उसे दिया जाये ताकि वह अपने मुवक्किल को ठीक से केस के बारे में समझा सके और कसाब समझ सके. कभी वो अपने पैसे मांगने लगता है. कभी उसे अपनी बोरियत दूर करने के लिये अखबार चाहिये होता है कभी उसे बैरक से बाहर निकल कर घूमने और वर्जिश करने की जरूरत महसूस होने लगती है. उसे इतने लोगो के मारने पर जो शर्मिंदगी महसूस होने लगी थी अचानक ना जाने कही गायब हो गई. और हमारे ब्लोगर वकीलदोस्त कहते है कि इस तरह उसे न्याय दिलाया जा रहा है.
इन्ही सारे मसलो को समझने की कोशिश करते हुये हम तालीबानी घोषित हो गये थे. लेकिन उनहोने अचानक अब कसाब के साथ काजिम खान की भी परवी शुरू करदी
तो हमे फ़िर से कूछ सवाल सूझ गये. भाई माना हम पढे लिखे नही है पर ये कहा
लिखा है कि अनपढ न्यायालय और वकीलो के बारे मे नही जानता.१. एक साधारण वकील दिन मे ८ से १० कोर्ट केस अटैंड करता है तो क्या काजमी साहब जैसा जिसके जिम्मे नदीम ( गुलशन कुमार ह्त्याकांड) १९९३ की मुंबई बम कांड, इंडियन मुजाहिद्दीन ,माननीय दाऊद कास्कर के दाये हाथ एजाज पठान जैसे अनेक मासूम और मजलूम लोगो के लिये भी वकालत करते है केवल इसी एक केस मे हाथ डाले रहेगा ? (इस समय काजमी के पास तीस केस हैं)
२. क्या काजमी साहब को ये कार्य ( कासिब को बचाने का) इतना धार्मिक कृत्य लगा कि वो बाकी सारे केसो से हाथ खीच बैठे और उन सारे पुराने मुवक्किलो को बीच मे ही अल्लाह भरोसे छॊड बैठे ? तो भाई आप मे से कोई सज्जन मुझे बतायेंगे कि अगर इस अपराधी को फ़ासी के फ़ंदे से बचाना वकील साहब को इतने सबाब का काम लगा कि उन्होने पैसे वाले केस जिनसे वकील साहब को दिन मे पचास हजार या लाख रूपये की कमाई हो रही थी छॊडना उचित लगा तो फ़िर मुझे कासिब और उनके वकील साहब मे काले कोट के अलावा कोई अंतर नही दिखाई दे रहा . एक सबाब कमाने के लिये १६६ भारतीय नागरिको को मार देता है दूसरा सबाब कमाने के लिये उसे बचाने मे लग जाता है .या फ़िर अकेले इस केस से वकील साहब को बाकी सारे केसो के बराबर कमाई हो रही होगी . पैसा उसी चैनल से आ रहा होगा जिससे एजाज पठान और बाकियो के केस मे आ रहा था.
३. हर बडे वकील के पास कुछ प्रशिक्षु वकील होते है जो बिना किसी या फ़िर बहुत थोडे धन के लिये उसके साथ काम करते है . सो ये बाकी केसो मे तारीख लेना और अन्य कार्य निपटाते है. अदालत मे शायद आपको पता नही जजसाहब के साथ बैठे पेशकार से लेकर लिपिक तक डायरी चढाने वाले से लेकर साथ के कमरे मे बैठे नोटिस टाईप करने और तामील कराने वाले को हर तारीख पर पैसे दिये जाते है . ये एक सामान्य पर्क्रिया है न्याय पालिका की .इस सब कार्य के लिये मुवक्किल से लिये गये हर तारीख पर पैसे से ही इन सब ( प्रक्षिशु वकील और अन्य खर्चे ) का खर्चा निकल आता है. और इस केस मे ये खर्चे भी नही मिलने वाले . तो ये इत्ता घाटे का सौदा कैसे कर गये काजिम साहब . ये भी हमे बता ही दीजीये जनाब . जब आप उनहे मिलने वाले २५०० रुपये रोज की सफ़ाई मे आ खडे हुये है . यानी मामला सबाब या फ़िर कही और से मिलने वाले पैसे का ही है ना ?
३. अब अगर हमारे माननीय वकील साहब टाइपिस्ट, क्लर्क, चालक आदि के वेतन, वाहन का खर्च, ऑफिस का खर्च, पुस्तकों, कम्प्यूटर, इंटरनेट व
स्टेशनरी आदि का खर्च सारे खर्चे एक ही बेचारे एक ही कासिब पर डालना चाहते है तो अलग बात है . वैसे जनाब वकील साहब चाहे तो इसमे उनकी ला की पढाई का खर्चा भी जोड सकते है . लेकिन एक सवाल मेरा भी है कि बाकी सारे प्रोफ़ेशनलस का खर्चा भी उनकी फ़ीस मे शामिल ही होता है उन्हे भी कार ड्राईवर कागज पेन कंप्यूटर स्टेशनरी फ़्री मे नही आती जनाबे आली, तो इन वकील साहब के लिये इत्ती पैरवी काहे जनाब ?
४ हमे भी वकील साहब की फ़ीस २५०० रुपये रोज कोई ज्यादा नही लग रही . और वो भी अपराधिक मामलो के इत्ते फ़ेमस वकील साहब की . इससे कई गुना फ़ीस तो वकील साहब अपनी १० मिनट की एक सिंटिंग मे दी गई राय की ले लेते होंगे . हमे तो शको शुबह वकील साहब सुबह ११ बजेसे शाम पांच बजे तक हफ़्ते मे पांच दिन इस केस को इत्ती कम फ़ीस पर इस केस को लेने पर है. यानी मामला या तो सबाब कमाना है या फ़िर धन का प्रवाह कही और से ही है जनाबे आली . बाकी भारत मे जुगाड एक बडी चीज है . और दाऊद भाई के पुराने भरोसे के वकील के लिये कोई मुश्किल काम नही है जी .
५. जब भारतीय नागरिक के लिये सरकार की तरफ़ से न्याय दिलाने वाले वकील का खर्च ९०० रुपये ही है तब यहा इतनी दयानतदारी किसलिये ? या न्याय पालिका के लिये भी भारत सरकार की तरह नागरिको की जान का मूल्य अलग अलग है . गरीब ५ रुपये की चोरी के अपराधी के लिये उसकी जान की कीमत ९०० रुपये और उम्र कैद तथा १६६ भारतीय नागरिको को मारने वाला आतंकवादी न्याय के नाम पर हो रहे ड्रामे की कीमत आपके सामने है.
६. यह उन का बड़प्पन है कि उन्हों ने इस फीस में यह काम करना स्वीकार किया है।इस के बावजूद यदि यह कहा जा रहा है कि उन पर सरकार खजाना लुटा रही है1993 के मुम्बई बम धमाकों के एक अंडरवर्ल्ड आरोपी एजाज़ पठान को षडयन्त्र रचने और विस्फ़ोट में उसकी भूमिका हेतु दस साल कैद और सवा दो लाख रुपये जुर्माना की सजा मुकर्रर हुई। टाडा कोर्ट ने उसे जेल में ही रखने का आदेश दिया था। (इस खबर को यहाँ पढ़ें) एजाज़ पठान को दाऊद के भाई इब्राहिम कासकर के साथ 2003 में भारत लाया गया था। अब्बास काज़मी साहब ने कोर्ट द्वारा सरकार से एजाज़ पठान को “दिल की बीमारी के इलाज” के नाम पर दो लाख रुपये स्वीकृत करवाये (यानी सवा दो लाख के जुर्माने में से दो लाख रुपये तो वापस मिल ही गये)। कठोर सजायाफ़्ता कैदियों को महाराष्ट्र की दूरस्थ जेलों में भेजा जाता है, लेकिन एजाज़ पठान, काज़मी साहब की मेहरबानी से मुम्बई में आर्थर रोड जेल अस्पताल में ही जमा रहा, जहाँ उसकी दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई।
तो जनाब बडप्पन काहे का ? काहे का एहसान ? काहे आप अपने ब्लोग पर लिख लिख कर देश पर काजमी साहब का एहसान लादने मे लगे है जनाबे आली ? मामला हमारी समझ से परे है. हमतो अब अपने पर कसाब का और आपका भी एहसान मानने लगे है साहब .कि उसने भारत पर हमला किया और आपने उसको न्याय मिले दुनिया देखे कि उसे न्याय मिला है इस बात की पैरवी बाहर से ही सही पर करने मे लगे है.
वैसे आपकी नजर मे बाकी जो मरे वो मक्खी मच्छर थे .उन्हे जीने का हक तक नही था ? उन्हे भी एहसान मानना चाहिये कासिब का और उनके वकील का तथा उसे बाहर से समर्थन दे रहे आप सब का कि उनका क्षण भंगुर जीवन इस काम तो आया कि उनके मरने का केस और उसमे भारत की न्याय प्रक्रिया और उसमे अपराधी के मानवाधिकारो की चिंता दुनिया ने देख ली . उन्हे भी पता चल गया कि भारत के लोगो को अपने नागरिक के लिये न्याय मिलने से ज्यादा जरूरी दुनिया को दिखाना है कि यहा न्याय के नाम पर एक सीधे सच्चे भारतीय नागरिक के अलावा किसी से अन्याय नही होता यानी यू भी कहा जा सकता है कि लायर ( इसे वकील के संदर्भ मे ले झूठे की नही)की लायलटी जस्टिस के प्रति नही बल्की उसके क्लाईट के प्रति है और इस्रे ही लायर्स की भाषा मे न्याय करते है , यानी हम सारे भारतीय नागरिक गलती पर थे जो समझते थे की न्यालय मे न्याय मिलता है . धन्यवाद जी आपका जो आपने हमे इस सच से रूबरू करा दिया .
वैसे भाई साहब आप भी अपना कुछ बड्प्पन आस्ट्रेलिया मे मर रहे भारतीयो को न्याय दिलाने मे काहे नही खर्च करते . या भारत वंशियो का कोई कही कोई अधिकार नही है ? पाक मे बंगलादेश मे अरे वहा छॊडिये यही कश्मीर मे हिंदुओ को काहे नही आप न्याय दिलाने का बडप्पन दिखाते . लेकिन उनके मौलिक अधिकार छीनने वाले को न्याय दिलाने वालो के साथ खडे हुये रहते है आप जनाब सेकुलरता की थाती थामे ? . थू है ऐसी मानसिकता पर जिसे एक सामान्य भारतीय के अलावा बाकी सबके मानवाधिकार की चिंता रहे , और ऐसे टुच्चे बडप्पन पर . लेकिन क्या करे सेकुलर हो या वामपंथी सबकी लेखनी और वाणी और बुद्धी तीनो को एक सामान्य भारतीय नागरिक और गलती से वो हिंदू हो तो लकवा मार ही जाता है सेकुलरता और वाम पंथ चीज ही ऐसी है वैसे मुझे पता है कि आप दिल मे मुझे और उन भले मानुसो को जिन्होने जनाब काजिम साहब को जिम खाना क्लब से बाहर किया है, या जिन्होने आपके कसाब साहब के साथ भारत पधारे उनके संगी साथियो जिन्हे भारतीय सेना ने मार डाला( शायद आपके हिसाब से हत्या ) , जो उन्हे दफ़नाने के लिये भी जगह देने को तैयार नही है .ढेरो गालिया दे रहे होंगे . दीजीये लेकिन उसके साथ उनके मानवधिकार और जिंदा रहने के अधिकार की चिंता के साथ जॊ मासूम भारतीय इन हरामजादे कसाबो की गोलियो का शिकार हो काल कलवित हो गये है कभी उनके भी जीने के अधिकार के बारे मे सोचियेगा . शायद वो खुदा आपके भी कुछ गुनाह माफ़ करदे
*( ध्यान दे भले ही आपने खुद उसे गोलिया चलाते देखा हो लेकिन न्यायालय मे अपराधी सिद्ध होने से पहले मासूम के अलावा कुछ नही कह सकते )** ( जहा न्याय की देवी की आखो पर पट्टी बांध कर उसे हाथी की सूंड पकडा कर हाथी की पूछ गवाहो के जरिये बताई जाती हो)**जहा आपका वकील आपको कितना सच बोलना है और किस बोले हुये सच को आप कानूनन मुकरने का अधिकार रखते हो. तथा आप अपने द्वारा किये गये अपराध के दंड से किस किस तकनीकी आधार पर न्यायाधिकारी के सच जानते हुये भी बच सकते हो का ज्ञान कराता है.***वकील . वो आदमी जो आपको आपके किये गये अथवा किये जाने वाले अपराध से न्यायाधिकारी को कानून के तकनीकी छेदो के दाव पेचो मे घुमाकर आपको निरा शरीफ़ साबित करदे . लेकिन दिल्ली के दो बडे वकील आई यू खान और आर के आनन्द की तरह पकडा ना जाये जी .
shashi kant tiwari
Monday, June 8, 2009
Sunday, June 7, 2009
पते की बात आपका पता आपके लिए जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा औरों के लिए है, ख़ासकर तब जब आपके पते में 10 जनपथ, 7 रेसकोर्स रोड या ए.बी. रोड जैसे मार्ग या फिर नरीमन पाइंट, एक्सप्रेस टावर, प्रेस कॉम्प्लेक्स या चेतक सेंटर जैसे पहचान चिह्न हों। आपका पता महज एक पता हो सकता है या फिर आपका संपूर्ण अता-पता बताने वाला साधन भी हो सकता है. आपका पता आपके रहन-सहन, स्टेटस-सिंबल और दुनिया भर के, ढेर सारे अन्य कई ढंके छिपे चीजों के बारे में विस्तार से प्रकाश डालने वाला साधन भी हो सकता है. मसलन, कनाट प्लेस का चपरासी और नरीमन पाइंट का गार्ड भी हो सकता है कि अपनी ड्यूटी करने को मर्सिडीज़ बैंज में आएँ और उधर साइबेरिया का लैंडलॉर्ड भी जरा-जरा सी सुविधाओं को तरसे. किसी का पता बहुत छोटा होता है तो किसी का बहुत लंबा. छोटे पते तो तत्काल याद हो जाते हैं परंतु बड़े-बड़े पते याद रखना मुश्किल होता है. परंतु आदमी अगर बड़ा है तो उसका मीलों लंबा पता भी लोग जाने कैसे याद रख लेते हैं. एक गाँव का गरीब रमई अपने पते में अपने नाम के आगे गांव, ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत इत्यादि सभी कुछ लिख डालने के बाद भी अपनी चिट्ठी के मिल पाने की उम्मीद जरा कम ही रखता है. कारण, ऐसे पते को कोई याद ही नहीं रखना चाहता. वैसे उस रमई के पास हर पाँचवे साल में कुछ भिखारियों की फ़ौज जरूर पहुँच जाती है जो उससे हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ा कर और कुछ लोग अपने जाति धर्म का वास्ता देकर वोट माँगने चले आते हैं. वैसे कुछ ख़ास किस्म के पते को लोग खुशी-खुशी याद रखने की कोशिश करते हैं, जैसे कि ख़ूबसूरत लैलाओं के कई-कई पते आज के आधुनिक मजनूँ जुबानी याद रखते हैं, और जिस मजनूं के पते की ऐसी सूची ज्यादा लंबी होती है वह उतना ही ज्यादा सफल माना जाता है. इसके विपरीत कुछ पतों को लोग याद ही नहीं रखना चाहते, वरन् यह भी चाहते हैं कि दुनिया से ऐसे पतों का नामोनिशान मिटा दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए टैक्स ऑफ़िसों का पता कोई भी किसी सूरत याद नहीं रखना चाहेगा और सपने में भी उसे भूलने की कोशिश करेगा. कुछ पते लोगों को मज़बूरी में, जबरन, जबर्दस्ती याद रखने पड़ते हैं, जैसे कि लेखकों को कई-कई संपादकों के पते हमेशा याद रखने होते हैं, ताकि उनकी स्वीकृत-अस्वीकृत, प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं को उचित-अनुचित स्थान मिल सके. जहाँ एक ओर चंद लोगों के कई-कई पते हो सकते हैं, वहीं बहुसंख्य अन्यों के साथ ये हो सकता है कि वे ता-उम्र एक अदद पता पाने की तलाश में जिंदगी गुज़ार दें. पते की बात यह भी है कि जहाँ एक ओर चुनावी चक्कर में, दिल्ली में रहने वाले नेतागण सुदूर आसाम या कन्याकुमारी का पता लिखवा रखते हैं, तो बड़े-बड़े माफिया डॉन के पते उनके द्वारा खुले आम अपहरण, मारकाट करवाने के बावजूद पुलिस रेकॉर्ड में उपलब्ध नहीं रहते. ऐसे माफिया-डान-और-नेता अपने पते में मीटिंगें-पार्टियाँ करते रहने के बाद भी पुलिस रेकॉर्ड में पते से फरार बताए जाते हैं. चुनावों के समय नेता मतदाताओं के पते तलाशते फिरते हैं तो चुनावों के बाद इसके उलट मतदाता अपने नेता का पता तलाशता फिरता है. इसी प्रकार, जिंदगी भर हसीनाओं के पतों के पीछे भागने वाला सदाबहार आशिक अपने अंतिम समय में मुक्ति और शांति की तलाश में मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों के पते तलाशते फिरते हैं. आज के युग में लोगों के पते में भी परिवर्तन हो रहा है. अब अगर आपके पास आए किसी के पत्र में उसके पूरे पते की जगह ऐसा लिखा मिले: रवि@याहू.कॉम तो अचरज से अपनी उँगली मत दबाइए. यह उस व्यक्ति का आज के आधुनिक ब्रह्मांड का एकमात्र सच्चा और सही पता, ईमेल पता है, जिसके द्वारा आप भले ही उसके पास नहीं पहुँच पाएँ, आपकी भेजी लानतों के उस तक पहुँचने की पूरी गारंटी है, और इस बात की भी पूरी गारंटी है कि उस पते पर आपका भेजा हुआ संदेश डाक में कहीं भी खो नहीं सकता. हाँ, यह हो सकता है कि पाने वाले ने आपकी चिट्ठियों को खोलने से पहले ही रद्दी की टोकरी में डालने की पूर्व व्यवस्था कर रखी हो. ईमेल पर भेजी गई आपकी चिट्ठियाँ तत्काल और तत्क्षण सामने वाले को मिल जाती हैं. इधर आपने चिट्ठी भेजी नहीं उधर चिट्ठी मिली नहीं और इधर जवाब आया नहीं. यह नहीं कि एक बार चिट्ठी भेज दिया तो फिर इंतजार करते रहिए हफ़्ते-दस दिन अपने जवाब का. इसीलिए ईमेल उपयोक्ता बंधु अब डाक-घरों की चिट्ठियों को स्नेल-मेल कहने लगे हैं. यानी रेंगने वाले कीड़े की गति से चलने वाली डाक. अमूनन व्यक्ति को अपनी चीज़ें प्यारी लगती हैं, परंतु पते के मामले में प्राय: उलटा होता है. यहाँ उसे दूसरों की पत्नियों की तरह दूसरों के पते प्यारे लगते हैं. उदाहरण के लिए लैलाओं को मजनुओं के पते, व्यापारियों को ग्राहकों के पते, नेताओं को अपने मतदाताओं के पते प्यारे लगते हैं. औरतों को अपने मायके का पता प्यारा लगता है तो विवाहित पुरुषों को अपनी सालियों के पते. रतलाम के रहने वाले रवि को इंदौर का पता ललचाता है तो इंदौर वाला मुंबई की ओर दौड़ लगाता है. मुंबई वाला शंघाई, न्यूयॉर्क और सिडनी की ओर दौड़ लगाने की फ़िराक़ में रहते हैं. इससे पूर्व कि बेपते की बेतुकी, इन फ़िजूल बातों को पढ़ते-पढ़ते आपके सब्र का अता पता भी गायब हो और आप मेरे पते तलाशते फिरें, इन पतों को अभी अधूरा ही छोड़ता हूँ.
आपका शशि कान्त तिवारी
ये है मस्ती की पाठसाला
आजकल मैंने फिर से पाठशाला का रुख़ किया है। अब यह न पूछें कि क्या पढ़ा जा रहा है क्यों कि जो कुछ पढ़ा जा रहा है उसमें खास कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पढ़ने का वातावरण ही दिखाई नहीं देता। लगता है पूरा पाठ्यक्रम समाप्त होने तक यह मौसम बदलने वाला नहीं।
कुछ समझ में नहीं आ रहा है तो फिर पाठशाला जाने का फ़ायदा? अरे, पैसे चुकाए हैं तीस पाठों के, वो तो वसूलने ही हैं और फिर ऐसी आरामगाहनुमा पाठशाला भारत में सात जनम नहीं मिलने वाली। यह समझकर मुझे तो सातों जन्मों के ऐश इसी पाठशाला में पूरे करने हैं। शाम को आराम से कपड़े बदलो, जो मन आए पहनो और निकल पड़ो। पाठशाला के शानदार भवन में प्रवेश करो। आलीशान बरामदे में लगी कोल्ड ड्रिंक की मशीन से एक बीब्सी निकालो और हाथ में लिए हुए कक्षा में चले जाओ। छोटी छोटी कक्षाएँ जिसमें मुश्किल से १० कुर्सी मेज़ें होती हैं। बाहर का तापमान १५ डिग्री सेल्सियस होने के बावजूद स्प्लिट एसी फर्राटे से चल रहा होता है। मन करे कक्षा में बैठो या फिर बरामदे में शाम की सैर का कोटा पूरा करो- कोई रोकटोक नहीं। कक्षा में अध्यापक से पहले पहुँचने की ज़रूरत नहीं। वह आ जाए तो भी बीब्सी फेंकने की ज़रूरत नहीं। मेज़ पर रख लो आराम से पीते रहो और खाली हो जाए तो वहीं छोड़कर चल दो। अध्यापक फेंक देगा।
सबसे मज़े की बात यह कि वह कक्षा में आकर अपना परिचय देगा, "मेरा नाम वाइल है और मैं आपको पहला पाठ पढ़ाने आया हूँ।" बेचारा २५-२६ साल का अध्यापक, पढ़ने वाले ५० साल के। आश्चर्य की बात यह कि भारत से बिलकुल विपरीत यहाँ विद्यार्थी अध्यापक का नाम लेकर पुकारते हैं और अध्यापक विद्यार्थियों के संबोधित करते हुए कहता है मैम, सर...
और भी मज़े की बात ज्यादातर लोग अपना पाठ याद नहीं करते। इसके बावजूद न कोई शर्म, न हीन भावना, न किसी का डर। एक नमूना देखें-विद्यार्थी- "ओह वाइल, कल का पाठ तो बहुत ही कठिन था मुझे ठीक से याद भी नहीं हुआ।"वाइल- "मुझे मालूम है सर, इसीलिए तो मैं आपकी मदद करने आया हूँ। एक पाठ को याद करने के लिए तीन दिन आपको दिए जाते हैं अभी तो एक ही दिन गुज़रा है मुझे पूरी आशा है कि कल तक आपको सब कुछ याद हो जाएगा।"विद्यार्थी- "हाँ, हाँ, तुम ठीक कहते हो वाइल, मेरे प्यारे बच्चे। हो जाएगा याद मुझे।"
अगर ऐसे आशावादी अध्यापक मिल जाएँ जो प्यारे भी हों और बच्चे भी तो फिर कौन पाठशाला से भागने की सोचेगा?
कुछ समझ में नहीं आ रहा है तो फिर पाठशाला जाने का फ़ायदा? अरे, पैसे चुकाए हैं तीस पाठों के, वो तो वसूलने ही हैं और फिर ऐसी आरामगाहनुमा पाठशाला भारत में सात जनम नहीं मिलने वाली। यह समझकर मुझे तो सातों जन्मों के ऐश इसी पाठशाला में पूरे करने हैं। शाम को आराम से कपड़े बदलो, जो मन आए पहनो और निकल पड़ो। पाठशाला के शानदार भवन में प्रवेश करो। आलीशान बरामदे में लगी कोल्ड ड्रिंक की मशीन से एक बीब्सी निकालो और हाथ में लिए हुए कक्षा में चले जाओ। छोटी छोटी कक्षाएँ जिसमें मुश्किल से १० कुर्सी मेज़ें होती हैं। बाहर का तापमान १५ डिग्री सेल्सियस होने के बावजूद स्प्लिट एसी फर्राटे से चल रहा होता है। मन करे कक्षा में बैठो या फिर बरामदे में शाम की सैर का कोटा पूरा करो- कोई रोकटोक नहीं। कक्षा में अध्यापक से पहले पहुँचने की ज़रूरत नहीं। वह आ जाए तो भी बीब्सी फेंकने की ज़रूरत नहीं। मेज़ पर रख लो आराम से पीते रहो और खाली हो जाए तो वहीं छोड़कर चल दो। अध्यापक फेंक देगा।
सबसे मज़े की बात यह कि वह कक्षा में आकर अपना परिचय देगा, "मेरा नाम वाइल है और मैं आपको पहला पाठ पढ़ाने आया हूँ।" बेचारा २५-२६ साल का अध्यापक, पढ़ने वाले ५० साल के। आश्चर्य की बात यह कि भारत से बिलकुल विपरीत यहाँ विद्यार्थी अध्यापक का नाम लेकर पुकारते हैं और अध्यापक विद्यार्थियों के संबोधित करते हुए कहता है मैम, सर...
और भी मज़े की बात ज्यादातर लोग अपना पाठ याद नहीं करते। इसके बावजूद न कोई शर्म, न हीन भावना, न किसी का डर। एक नमूना देखें-विद्यार्थी- "ओह वाइल, कल का पाठ तो बहुत ही कठिन था मुझे ठीक से याद भी नहीं हुआ।"वाइल- "मुझे मालूम है सर, इसीलिए तो मैं आपकी मदद करने आया हूँ। एक पाठ को याद करने के लिए तीन दिन आपको दिए जाते हैं अभी तो एक ही दिन गुज़रा है मुझे पूरी आशा है कि कल तक आपको सब कुछ याद हो जाएगा।"विद्यार्थी- "हाँ, हाँ, तुम ठीक कहते हो वाइल, मेरे प्यारे बच्चे। हो जाएगा याद मुझे।"
अगर ऐसे आशावादी अध्यापक मिल जाएँ जो प्यारे भी हों और बच्चे भी तो फिर कौन पाठशाला से भागने की सोचेगा?
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